पर मेरे हाथों में न इश्क की कोई रेखा है।

 हमने मौसम को ही अक्सर बदलते देखा है।

कली को रोज ही गुलशन में खिलते देखा है।

आखिरी आस थी तुमसे के इश्क हो शायद।

पर मेरे हाथों में न इश्क की कोई रेखा है।

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